पृथ्वी के जलवायु को आकार देने में छोटे समुद्री शैवाल (फाइटोप्लैंकटन) की भूमिका जितनी पहले समझी गई थी, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। ये सूक्ष्म जीव ला नीना की बहु-वर्षीय घटनाओं के विकास को सीधे प्रभावित करते हैं, ऐसा एक नई खोज कहती है जो हमारे ग्रह के जलवायु तंत्र के बारे में हमारी समझ को बदल रही है।
चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज (IOCAS) के इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोलॉजी की एक शोध टीम द्वारा किया गया यह अध्ययन 25 मई को कम्युनिकेशन्स अर्थ एंड एनवायरनमेंट में प्रकाशित हुआ था। यह शोध इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे महासागर के सबसे छोटे निवासी भी वैश्विक जलवायु पैटर्न पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।
ला नीना: एक वैश्विक जलवायु चालक
ला नीना, उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के मध्य-पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान में लगातार असामान्य शीतलन को संदर्भित करता है। यह अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) के ठंडे चरण का प्रतिनिधित्व करता है, जो पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का एक महत्वपूर्ण घटक है और दुनिया भर में मौसम के पैटर्न को प्रभावित करता है, जिसमें सूखे, बाढ़ और चरम तापमान शामिल हैं। जब ला नीना की ऐसी घटना दो साल से अधिक समय तक बनी रहती है (जिसे बहु-वर्षीय ला नीना कहा जाता है), तो इसके वैश्विक जलवायु प्रभाव काफी मजबूत हो जाते हैं, जिससे दुनिया के कई हिस्सों में चरम मौसम की घटनाओं की गंभीरता बढ़ जाती है। हाल के दशकों में बहु-वर्षीय ला नीना की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं, लेकिन उनके विकास में समुद्री जैव-भू-रासायनिक प्रक्रियाओं की भूमिका अब तक अस्पष्ट थी।
पुराने दृष्टिकोण को चुनौती
लंबे समय से, ENSO के अध्ययन मुख्य रूप से महासागर और वायुमंडल के बीच की भौतिक अंतःक्रियाओं पर केंद्रित रहे हैं, जिसमें समुद्री जीवन की जटिल भूमिका की अनदेखी की गई थी। शोधकर्ताओं ने इस अंतर को दूर करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने यह परिकल्पना की कि फाइटोप्लैंकटन — सूक्ष्म जीव जिनमें क्लोरोफिल होता है, जो सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करते हैं और प्रकाश संश्लेषण करते हैं — इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण कुंजी हो सकते हैं। उनके सिद्धांत के अनुसार, अधिक क्लोरोफिल सौर विकिरण को सतह के पास फंसाता है, जिससे सतह का पानी गर्म होता है, जबकि कम क्लोरोफिल सूर्य के प्रकाश को गहराई में पहुंचने देता है, जिससे उपसतह का पानी गर्म होता है। यह समुद्री ऊष्मा वितरण को प्रभावित करता है, जो बदले में ला नीना के विकास को प्रभावित कर सकता है।
फाइटोप्लैंकटन की जटिल भूमिका
अपने परिकल्पना का परीक्षण करने के लिए, शोध टीम ने दशकों के उपग्रह अवलोकनों और उन्नत भौतिक-जैव-भू-रासायनिक युग्मित मॉडलों का उपयोग किया। इन मॉडलों ने उन्हें यह विश्लेषण करने की अनुमति दी कि फाइटोप्लैंकटन-जनित ताप प्रतिक्रिया बहु-वर्षीय ला नीना घटनाओं के विकास को कैसे प्रभावित करती है। उनके निष्कर्षों से फाइटोप्लैंकटन की भूमिका की एक जटिल और भिन्न तस्वीर सामने आई।
पश्चिमी-मध्य प्रशांत में प्रभाव: ला नीना का तीव्र होना
उनके परिणामों से पता चला कि बहु-वर्षीय ला नीना घटनाएँ पश्चिमी-मध्य भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में पूर्व-पश्चिम धाराओं को मजबूत करती हैं, जिससे लगातार दो वर्षों तक क्लोरोफिल का स्तर उच्च रहता है। इस बढ़े हुए क्लोरोफिल के स्तर से अधिक सौर विकिरण सतह के पास फँस जाता है। यह प्रक्रिया शुरू में सतह के शीतलन को धीमा करती है, लेकिन अंततः महासागर की मिश्रित परत को उथला कर देती है। मिश्रित परत महासागर की ऊपरी परत होती है जहाँ तापमान और अन्य गुण अपेक्षाकृत एक समान होते हैं। इस परत के उथले होने से भूमध्य रेखा से ध्रुवों तक गर्मी के संचलन में वृद्धि होती है, जिससे क्षेत्र और ठंडा हो जाता है और दूसरे वर्ष की ला नीना की स्थिति लगभग 8% तक तीव्र हो जाती है। यह एक महत्वपूर्ण वृद्धि है जो इन प्रमुख जलवायु घटनाओं की शक्ति और अवधि पर सीधा प्रभाव डालती है।
पूर्वी प्रशांत में प्रभाव: ला नीना का कमजोर होना
हालांकि, पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में एक विपरीत पैटर्न उभरता है। उत्तर-पश्चिमी प्रशांत में एक एंटीसाइक्लोन (उच्च दबाव प्रणाली) के प्रभाव में, दूसरे वर्ष में क्लोरोफिल का स्तर तेजी से गिर जाता है। क्लोरोफिल के कम होने से सूर्य के प्रकाश को उपसतह के पानी को गर्म करने की अनुमति मिलती है। यह गर्म उपसतह पानी फिर अपवेलिंग नामक प्रक्रिया के माध्यम से सतह पर उठता है – अपवेलिंग वह प्रक्रिया है जिसमें गहरे, ठंडे और पोषक तत्वों से भरपूर पानी समुद्र की सतह पर उठता है। यह उपसतह की गर्मी की वृद्धि दूसरे वर्ष की ला नीना को काफी कमजोर कर देती है, लगभग 45% तक। यह एक आश्चर्यजनक खोज थी, जो इस बात पर प्रकाश डालती है कि कैसे फाइटोप्लैंकटन का क्षेत्रीय वितरण और इसकी प्रतिक्रिया ला नीना के विकास को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित कर सकती है।

नई अंतर्दृष्टि और भविष्य के निहितार्थ
ये विपरीत क्लोरोफिल पैटर्न पूर्वी-पश्चिम समुद्र सतह तापमान ढाल को बढ़ाते हैं और वायु-समुद्र युग्मन को मजबूत करते हैं। वायु-समुद्र युग्मन महासागर और वायुमंडल के बीच की परस्पर क्रियाओं को संदर्भित करता है, जो एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और वैश्विक मौसम और जलवायु पैटर्न को निर्धारित करते हैं। यह खोज महासागर-वायुमंडल की अंतःक्रियाओं की पारंपरिक समझ को चुनौती देती है, यह दर्शाती है कि समुद्री जीवन को अब केवल निष्क्रिय खिलाड़ी के रूप में नहीं देखा जा सकता है। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि गहरे क्लोरोफिल की अधिकतम सांद्रता शीतलन प्रभाव को और बढ़ाती है, जो फाइटोप्लैंकटन के ऊर्ध्वाधर वितरण के महत्व पर जोर देती है।
यह अध्ययन पहला प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करता है कि फाइटोप्लैंकटन-जनित ताप अंतर-वार्षिक समय-सीमा पर बहु-वर्षीय ला नीना घटनाओं पर महत्वपूर्ण नियंत्रण रखता है। ये निष्कर्ष ENSO भविष्यवाणी मॉडल को बेहतर बनाने के लिए एक मजबूत भौतिक आधार प्रदान करते हैं, जिससे मौसम विज्ञानी भविष्य के ला नीना घटनाओं की गंभीरता और अवधि का अधिक सटीक अनुमान लगा सकेंगे। अंततः, यह ग्लोबल वार्मिंग के तहत जलवायु जोखिम की रोकथाम और अनुकूलन रणनीतियों का समर्थन करता है, जिससे समाज को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिए बेहतर तैयारी करने में मदद मिलती है।
इस अध्ययन के पहले लेखक डॉ. तियान फेंग ने कहा, “छोटे फाइटोप्लैंकटन प्रमुख जलवायु घटनाओं को आकार देने में एक असाधारण भूमिका निभाते हैं — यह एक अनुस्मारक है कि महासागर के सबसे छोटे निवासी पृथ्वी के बदलते जलवायु को समझने के लिए बड़े सुराग रखते हैं।”
संदर्भ और कड़ियां (References & Links)
- मूल समाचार विज्ञप्ति: चीनी एकेडमी ऑफ साइंसेज
- शोध पत्र: कम्युनिकेशन्स अर्थ एंड एनवायरनमेंट / Phytoplankton-induced radiation effects reshape the evolution of multi-year La Niña




