स्थिर खड़े रहना या चलते समय संतुलन बनाए रखना हमारे दैनिक जीवन का एक सहज और अक्सर अनदेखा पहलू है। जब हम युवा होते हैं, तो हमारा मस्तिष्क बिना किसी सचेत प्रयास के इस जटिल कार्य को बखूबी संभालता है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ, यह सहज क्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है, जिससे गिरने का जोखिम बढ़ जाता है। दशकों से, वैज्ञानिक इस प्रक्रिया के पीछे के कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। अब, एक नए शोध ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि उम्र बढ़ने पर हमारे मस्तिष्क को संतुलन बनाए रखने के लिए कितनी अधिक और धीमी गति से काम करना पड़ता है।

संतुलन पर आयु का प्रभाव
जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हमारे संवेदी तंत्र (sensory systems) – जो हमें दुनिया के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं – धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं। इनमें दृष्टि, स्पर्श और सबसे महत्वपूर्ण रूप से, वेस्टिबुलर सिस्टम शामिल हैं। वेस्टिबुलर सिस्टम हमारे भीतरी कान में स्थित संवेदी नेटवर्क है जो संतुलन, स्थानिक अभिविन्यास और आँखों की गतिविधियों को नियंत्रित करता है। इन प्रणालियों का कमजोर पड़ना संतुलन नियंत्रण के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करता है और परिणामस्वरूप गिरने के जोखिम को बढ़ाता है। दुर्भाग्य से, बुजुर्गों में गिरना एक गंभीर समस्या है, जिसके कारण अक्सर चोटें, विकलांगता और जीवन की गुणवत्ता में कमी आती है। इस चुनौती के बावजूद, मस्तिष्क की भूमिका को अब तक केवल परोक्ष रूप से ही खोजा गया था, जैसे कि लोगों से चलते या खड़े होते समय मानसिक कार्य करने के लिए कहा जाता था।
शोध का अनूठा दृष्टिकोण
यूनिवर्सिटी कॉलेज डबलिन (UCD) और यूएलबी न्यूरोसाइंस इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने इस समस्या पर एक नया दृष्टिकोण अपनाया है। उन्होंने सीधे तौर पर उन मस्तिष्क तंत्रों की पड़ताल की जो उम्र-संबंधी मुद्रा नियंत्रण (postural control) में परिवर्तन लाते हैं। उनके अभिनव दृष्टिकोण ने यह चौंकाने वाला खुलासा किया कि बुजुर्गों के मस्तिष्क को संवेदी जानकारी को संसाधित करने और गति को नियंत्रित करने के लिए युवाओं की तुलना में काफी अधिक मेहनत करनी पड़ती है। इसके अलावा, उन्होंने एक महत्वपूर्ण ‘प्रोसेसिंग विलंब’ भी पाया।
यह महत्वपूर्ण शोध मंगलवार, 2 जून, 2026 को प्रतिष्ठित जर्नल पीएनएएस (प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज) में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन का नेतृत्व यूसीडी स्कूल ऑफ इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग के डॉ. थॉमस लेग्रैंड ने स्कॉट मोंगॉल्ड, मैथ्यू बुर्गिनन और मार्क वेंडर घिंस्ट के नेतृत्व में न्यूरोसाइंटिस्टों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम के साथ मिलकर किया।
अध्ययन का तरीका और चौंकाने वाले निष्कर्ष
शोध दल ने लगभग 60 युवा वयस्कों (30 वर्ष से कम उम्र के) और 60 से अधिक उम्र के लगभग 60 लोगों के साथ काम किया। प्रत्येक प्रतिभागी की मस्तिष्क गतिविधि को रिकॉर्ड किया गया, जब वे एक ठोस, समान सतह पर या फोम ब्लॉक पर खड़े थे, और बारी-बारी से उनकी आँखें खुली या बंद थीं। प्रतिभागियों के वेस्टिबुलर सिस्टम का भी गहन मूल्यांकन किया गया, ताकि भीतरी कान के संतुलन संबंधी कार्यों की स्थिति का पता चल सके।
अध्ययन के परिणामों ने स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया कि जब बुजुर्ग संतुलन बनाए रखने की कोशिश करते हैं, तो उनकी मस्तिष्क गतिविधि सीधे इस बात से जुड़ी होती है कि वे कितना डगमगाते हैं, खासकर चुनौतीपूर्ण संतुलन स्थितियों में। जिन लोगों में सबसे अधिक डगमगाहट देखी गई, उनमें मस्तिष्क की गतिविधि भी सबसे अधिक थी।
डॉ. लेग्रैंड ने इस खोज के महत्व पर जोर देते हुए कहा, “इसका मतलब है कि बुजुर्गों को सीधे खड़े रहने के लिए अपने मस्तिष्क के कुछ हिस्सों का उपयोग करके सक्रिय रूप से अपना संतुलन बनाए रखना पड़ता है।” उन्होंने आगे बताया, “दूसरी ओर, युवा लोग स्वचालित रूप से संतुलन बनाए रखते हैं, बिना इसके बारे में सोचे या मानसिक ऊर्जा खर्च किए।”
एक और महत्वपूर्ण खोज यह थी कि बुजुर्ग व्यक्ति के मस्तिष्क को संतुलन संबंधी जानकारी को संसाधित करने में काफी अधिक समय लगता है, लगभग 50 प्रतिशत अधिक। दिलचस्प बात यह है कि हालांकि कई बुजुर्ग प्रतिभागियों में भीतरी कान में गिरावट देखी गई, लेकिन यह उनके मस्तिष्क के इतना अधिक मेहनत करने का प्राथमिक कारण नहीं था। यह दर्शाता है कि मस्तिष्क खुद ही उम्र बढ़ने के साथ संतुलन बनाए रखने के लिए अधिक संसाधन लगा रहा है, भले ही संवेदी इनपुट में कमी न आई हो।
भविष्य के निहितार्थ और उम्मीदें
यह शोध हमें यह समझने में मदद करता है कि उम्र बढ़ने वाला मस्तिष्क संतुलन को कैसे नियंत्रित करता है, और यह भविष्य के चिकित्सा और न्यूरोसाइंस अध्ययनों के लिए द्वार खोलता है। इन अध्ययनों का उद्देश्य बुजुर्गों में गिरने के जोखिम का अनुमान लगाना और उम्मीद है कि इसे रोकना होगा। इस ज्ञान का उपयोग करके, वैज्ञानिक नए उपचार, पुनर्वास रणनीतियाँ और सहायक उपकरण विकसित कर सकते हैं जो बुजुर्गों को अपने संतुलन को बेहतर बनाने और गिरने से बचने में मदद कर सकते हैं, जिससे उन्हें अधिक स्वतंत्र और सक्रिय जीवन जीने में सहायता मिलेगी।
यह शोध न केवल उम्र बढ़ने की प्रक्रिया में मस्तिष्क की भूमिका को गहराई से समझने में मदद करता है, बल्कि यह भविष्य में बुजुर्ग आबादी के लिए बेहतर स्वास्थ्य परिणामों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है। यह हमें याद दिलाता है कि भले ही हमारा शरीर उम्र के साथ बदलता है, मस्तिष्क की अद्भुत अनुकूलन क्षमता हमें चुनौतियों का सामना करने में मदद करती है, भले ही इसके लिए उसे थोड़ी अधिक मेहनत करनी पड़े।
संदर्भ और कड़ियां (References & Links)
- मूल समाचार विज्ञप्ति: यूनिवर्सिटी कॉलेज डबलिन (UCD)
- शोध पत्र: पीएनएएस (PNAS)



