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फेफड़ों की जानलेवा बीमारी के इलाज का नया रास्ता खुला

फेफड़ों में रेशेदार ऊतक दिखाती वैज्ञानिक इमेज
पल्मोनरी फाइब्रोसिस फेफड़ों में दाग वाले ऊतक बनाता है, जिससे साँस लेना मुश्किल हो जाता है।

साँस लेना ज़िंदा रहने के लिए सबसे ज़रूरी है। लेकिन क्या होगा जब फेफड़े, हमारे शरीर का एक इतना अहम हिस्सा, खुद ही दुश्मन बन जाएँ? दुनिया भर में लाखों लोग फेफड़ों से जुड़ी जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे हैं, और इनमें से कुछ के लिए तो आज तक कोई पुख्ता इलाज भी नहीं मिल पाया है। अब, यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी (UTS) और मोनाश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी बड़ी खोज की है जो फेफड़ों की एक घातक बीमारी, पल्मोनरी फाइब्रोसिस, के इलाज का रास्ता साफ कर सकती है। यह शोध उन दाग वाले ऊतकों को बनने से रोकने में मदद कर सकता है, जो इस बीमारी को जानलेवा बनाते हैं।

पल्मोनरी फाइब्रोसिस: एक रहस्यमय और घातक दुश्मन

पल्मोनरी फाइब्रोसिस एक बेहद गंभीर बीमारी है जिसमें फेफड़ों के अंदर रेशेदार ऊतक (scar tissue) बढ़ने लगते हैं। ये दाग वाले ऊतक धीरे-धीरे फेफड़ों को सख्त कर देते हैं और उनकी लोच को खत्म कर देते हैं, जिससे साँस लेना लगातार मुश्किल होता जाता है। कल्पना कीजिए कि आपके फेफड़े किसी स्पंज की तरह काम करने के बजाय, कड़े और बेजान पत्थर की तरह हो रहे हों। यह स्थिति कितनी भयावह हो सकती है। ऑस्ट्रेलिया में ही हर साल लगभग 2170 लोगों को इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस (IPF) का पता चलता है। ‘इडियोपैथिक’ का मतलब है कि इस बीमारी का कोई ज्ञात कारण नहीं है, जो इसे और भी खतरनाक बना देता है।

UTS स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज के एसोसिएट प्रोफेसर गैंग लियू बताते हैं, “पल्मोनरी फाइब्रोसिस में, शरीर की सामान्य घाव भरने की प्रक्रिया ही गड़बड़ हो जाती है। ऊतकों को ठीक करने के बजाय, यह फेफड़ों में दाग वाले ऊतक बनाना शुरू कर देती है।”

आज तक, इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस से पीड़ित लोगों के लिए जीवनकाल बहुत छोटा होता है, आमतौर पर निदान के बाद केवल 2 से 5 साल। इस बीमारी के इलाज के लिए सिर्फ दो दवाएँ ही मंज़ूर हैं, और उनमें से कोई भी दाग को खत्म नहीं कर सकती या बीमारी को पूरी तरह से ठीक नहीं कर सकती। यही कारण है कि इस क्षेत्र में नई खोजें इतनी अहमियत रखती हैं।

विट्रोनेक्टिन और मैक्रोफेज: एक नई समझ

एसोसिएट प्रोफेसर लियू, जो साइंस एडवांसेज जर्नल में छपे इस नए अध्ययन के सह-प्रमुख लेखक हैं, ने फेफड़ों में एक ऐसे प्रोटीन की पहचान की है जो दाग बनने की प्रक्रिया को शुरू कर सकता है। इस प्रोटीन का नाम है विट्रोनेक्टिन। यह खोज इस घातक बीमारी को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

हमारे शरीर में रोग प्रतिरोधक कोशिकाएँ (immune cells) होती हैं जिन्हें मैक्रोफेज कहा जाता है। ये कोशिकाएँ चोट लगने के बाद ऊतकों की मरम्मत में मदद करती हैं। ये एक तरह से शरीर के सफाईकर्मी और मरम्मत करने वाले मजदूर होते हैं।

हमने पाया कि ये रोग प्रतिरोधक कोशिकाएँ कभी-कभी सामान्य घाव भरने के बजाय, दाग वाले ऊतक बनाने के लिए फिर से प्रोग्राम की जाती हैं।

एसोसिएट प्रोफेसर गैंग लियू, UTS स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज

प्रयोगशाला में एसोसिएट प्रोफेसर गैंग लियू
एसोसिएट प्रोफेसर गैंग लियू प्रयोगशाला में शोध करते हुए।

मोनाश यूनिवर्सिटी के बायोकेमिस्ट्री और मॉलिक्यूलर बायोलॉजी विभाग की वरिष्ठ लेखक, एसोसिएट प्रोफेसर कैटरीना बिंगर ने एक खास 3डी टिश्यू कल्चर सिस्टम बनाया। यह सिस्टम फेफड़ों में फाइब्रोसिस की स्थिति की नकल करता है, यानी यह प्रयोगशाला में एक ऐसा वातावरण तैयार करता है जो बीमार फेफड़ों जैसा दिखता है। इसी सिस्टम का उपयोग करके उन्होंने पाया कि विट्रोनेक्टिन नामक प्रोटीन मैक्रोफेज कोशिकाओं को ‘स्विच ऑन’ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे वे मरम्मत के बजाय दाग वाले ऊतक बनाने लगते हैं।

एसोसिएट प्रोफेसर बिंगर ने इस खोज के बारे में बताते हुए कहा, “हम आमतौर पर विट्रोनेक्टिन को एक संरचनात्मक प्रोटीन के रूप में जानते हैं जो फेफड़ों जैसे अंगों की अखंडता बनाए रखता है। लेकिन हमने पाया कि यह एक संकेत (signal) के रूप में भी काम कर सकता है।”

उन्होंने आगे बताया, “विट्रोनेक्टिन मैक्रोफेज के ऊर्जा उत्पादन के तरीके को बदल देता है, और यह उन्हें एक बढ़ी हुई फाइब्रोटिक स्थिति में धकेल देता है।” यह फाइब्रोसिस कैसे होता है, इसे समझने का एक बिलकुल नया तरीका है, और यह केवल इन कोशिकाओं का अधिक प्राकृतिक, 3डी वातावरण में अध्ययन करने से ही संभव हो पाया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो कुछ भी उन्होंने अपने 3डी कल्चर में देखा, वह एसोसिएट प्रोफेसर लियू की टीम द्वारा चलाए गए पशु मॉडल और IPF रोगियों के ऊतक नमूनों से पूरी तरह मेल खाता था। यह इस बात का सबूत है कि उनकी प्रयोगशाला में की गई खोज असल में मानव शरीर में भी काम करती है।

इलाज की दिशा में अगला कदम

वैज्ञानिकों की टीम का अगला कदम ऐसे नए इलाज खोजना है जो विट्रोनेक्टिन-मैक्रोफेज मार्ग का उपयोग करके IPF का उपचार कर सकें। यह मार्ग, या यूँ कहें कि यह अंदरूनी रास्ता, वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करेगा कि बीमारी कैसे बढ़ती है और इसे कैसे रोका जा सकता है।

एसोसिएट प्रोफेसर लियू आशावादी होकर कहते हैं, “इस क्रियाविधि को समझना फाइब्रोसिस के रोगियों के लिए नए चिकित्सीय एजेंटों (therapeutic agents) की पहचान करने के लिए बहुत ज़रूरी है।” चिकित्सीय एजेंट वे पदार्थ होते हैं जिनका उपयोग बीमारी के इलाज या रोकथाम के लिए किया जा सकता है।

उन्होंने आगे कहा, “अब हम ऐसी नई दवाएँ खोजने पर काम कर सकते हैं जो विट्रोनेक्टिन को सबसे प्रभावी ढंग से रोक सकें, ताकि हम इस शोध को क्लीनिकल अभ्यास में ला सकें और इस दुर्बल कर देने वाली बीमारी का एक नया इलाज खोजने में मदद कर सकें।” यह खोज पल्मोनरी फाइब्रोसिस जैसी बीमारियों से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए एक नई उम्मीद जगाती है, जिससे भविष्य में एक प्रभावी और स्थायी इलाज की संभावना बनती है।

संदर्भ और कड़ियां (References & Links)