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‘नन्हे दिमागों’ ने की सिज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर की पहचान

कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया की, जहां मानसिक रोगों का इलाज केवल डॉक्टर के अनुमान या लक्षणों की बातचीत पर निर्भर न हो, बल्कि उसे उसी सटीकता से पहचाना जा सके जैसे हम रक्त जांच से मधुमेह (Diabetes) या मलेरिया का पता लगाते हैं। विज्ञान ने इस दिशा में एक लंबी छलांग लगाई है। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में विकसित मटर के दाने के आकार के ‘नन्हे मानव मस्तिष्कों’ (Brain Organoids) और मशीन लर्निंग की मदद से सिज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर जैसी जटिल मानसिक बीमारियों के छिपे हुए विद्युत संकेतों को डिकोड करने में सफलता प्राप्त की है।

यह शोध केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि उन करोड़ों लोगों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है जो इन बीमारियों के चलते अंधेरे में जी रहे हैं।

निदान की पहेली और विज्ञान का उत्तर

पार्किंसंस जैसे न्यूरोलॉजिकल रोगों के विपरीत, जहां डॉक्टर डोपामाइन के स्तर या विशिष्ट एंजाइमों को मापकर बीमारी का पता लगा सकते हैं, मानसिक रोगों का कोई स्पष्ट ‘बायोमार्कर’ (जैविक संकेत) अब तक उपलब्ध नहीं था। सिज़ोफ्रेनिया या बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित मरीज का मस्तिष्क बाहर से देखने पर सामान्य लग सकता है, लेकिन उसके भीतर विचारों और भावनाओं का एक भयावह तूफान चल रहा होता है।

इस अध्ययन का नेतृत्व कर रही जॉन्स हॉपकिन्स की बायोमेडिकल इंजीनियर, डॉ. एनी कथूरिया (Dr. Annie Kathuria) कहती हैं, “सिज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर का निदान बहुत कठिन है क्योंकि मस्तिष्क का कोई एक विशेष हिस्सा खराब नहीं होता। हमारी उम्मीद है कि भविष्य में हम ‘ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स’ के जरिए न केवल मरीज की बीमारी की पुष्टि कर पाएंगे, बल्कि यह भी तय कर पाएंगे कि कौन सी दवा किस मात्रा में उसे ठीक कर सकती है।”

क्या हैं ये ‘ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स’?

आम भाषा में समझें तो ‘ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स’ (Brain Organoids) प्रयोगशाला में उगाए गए मस्तिष्क के बेहद छोटे, त्रि-आयामी (3D) मॉडल हैं। शोधकर्ताओं ने सिज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित मरीजों और स्वस्थ व्यक्तियों की त्वचा और रक्त कोशिकाओं को लिया। फिर, स्टेम सेल तकनीक का उपयोग करके इन कोशिकाओं को वापस उनकी प्रारंभिक अवस्था में लाया गया और उन्हें मस्तिष्क की कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) के रूप में विकसित होने के लिए प्रेरित किया गया।

ये नन्हे ‘ऑर्गेनॉइड्स’ पूरी तरह से विकसित मानव मस्तिष्क नहीं हैं, लेकिन इनमें मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (निर्णय लेने और सोचने वाला हिस्सा) जैसी जटिल संरचनाएं और कोशिकाएं मौजूद होती हैं। इनमें ‘माइलिन’ (Myelin) भी पाया गया, जो तंत्रिकाओं के चारों ओर बिजली के तारों पर लगे प्लास्टिक कवर की तरह काम करता है, ताकि संदेशों का आदान-प्रदान तेजी से हो सके।

विद्युत तूफानों की पहचान

जब ये नन्हे मस्तिष्क विकसित हुए, तो उनके न्यूरॉन्स ने आपस में बातचीत करना शुरू कर दिया—ठीक वैसे ही जैसे हमारे दिमाग में होता है। शोधकर्ताओं ने इन ऑर्गेनॉइड्स को एक विशेष माइक्रोचिप पर रखा, जो इलेक्ट्रोड्स के जाल से बनी थी। यह सेटअप एक सूक्ष्म ईईजी (EEG) मशीन की तरह काम करता था, जो नन्हे दिमागों की विद्युत गतिविधि को रिकॉर्ड कर रहा था।

यहीं पर मशीन लर्निंग (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की भूमिका सामने आई। एआई एल्गोरिदम ने इन विद्युत संकेतों का विश्लेषण किया और पाया कि बीमार और स्वस्थ मस्तिष्कों के ‘फायरिंग पैटर्न’ (संकेत भेजने के तरीके) में जमीन-आसमान का अंतर था। सिज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर वाले ऑर्गेनॉइड्स में विद्युत तरंगों का एक विशिष्ट और अनियमित पैटर्न देखा गया।

शुरुआत में, एआई ने 83% सटीकता के साथ बीमारी की पहचान की। लेकिन जब शोधकर्ताओं ने इन नन्हे दिमागों को बेहद हल्का सा विद्युत झटका (stimulation) दिया, तो छुपे हुए पैटर्न और स्पष्ट हो गए, और पहचान की सटीकता बढ़कर 92% हो गई। यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।

‘ट्रायल और एरर’ का अंत?

वर्तमान चिकित्सा पद्धति में, मानसिक रोगों का इलाज अक्सर ‘अंधेरे में तीर चलाने’ जैसा होता है। डॉ. कथूरिया बताती हैं, “ज्यादातर डॉक्टर ‘ट्रायल और एरर’ (प्रयास और त्रुटि) विधि से दवा देते हैं। सही दवा खोजने में मरीज को 6 या 7 महीने लग सकते हैं।” उदाहरण के लिए, क्लोज़ापाइन (Clozapine) सिज़ोफ्रेनिया की एक आम दवा है, लेकिन लगभग 40% मरीजों पर इसका असर नहीं होता।

इस शोध का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव यह हो सकता है कि डॉक्टर मरीज को दवा देने से पहले, उसकी कोशिकाओं से बने ‘नन्हे दिमाग’ पर दवा का परीक्षण कर सकेंगे। यानी मरीज को गिनी पिग बनने की जरूरत नहीं होगी; उसका इलाज उसके अपने जैविक मॉडल पर परखा जा सकेगा।

हालांकि, यह अध्ययन अभी छोटे स्तर पर (12 मरीजों के सैंपल के साथ) किया गया है, लेकिन इसके परिणाम दूरगामी हैं। ‘एपीएल बायोइंजीनियरिंग’ (APL Bioengineering) पत्रिका में प्रकाशित यह शोध बताता है कि हम उस भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहां मानसिक स्वास्थ्य को भी उसी वैज्ञानिक कठोरता और सटीकता के साथ देखा जाएगा, जैसे हम हृदय या किडनी के रोगों को देखते हैं। यह न केवल चिकित्सा विज्ञान की जीत है, बल्कि उन लाखों परिवारों के लिए एक आश्वासन भी है जो अपने प्रियजनों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं।