कल्पना कीजिए कि आपके सामने एक बंद स्टील का बक्सा रखा है। उस बक्से के अंदर एक बिल्ली है। सामान्य तर्क (logic) कहता है कि बिल्ली या तो जीवित होगी या मृत। लेकिन क्वांटम भौतिकी की अजीबोगरीब दुनिया में, जब तक आप उस बक्से को खोलकर देख नहीं लेते, बिल्ली एक ही समय में जीवित भी है और मृत भी।
यह सुनने में किसी जादू या पागलपन जैसा लग सकता है, लेकिन यह विज्ञान के इतिहास का सबसे प्रसिद्ध ‘थॉट एक्सपेरिमेंट’ (वैचारिक प्रयोग) है, जिसे “श्रोडिंगर की बिल्ली” (Schrödinger’s Cat) के नाम से जाना जाता है। यह प्रयोग हमें यह समझने में मदद करता है कि परमाणु (atom) के स्तर पर वास्तविकता हमारे दैनिक जीवन के नियमों से कितनी अलग होती है।

दाईं तरफ़ तीन नोबेल विजेता (1933)- पॉल डिरैक, वर्नर हाइज़नबर्ग और इरविन श्रोडिंगर।
एक विरोधाभास का जन्म
इस प्रयोग की परिकल्पना ऑस्ट्रियाई भौतिक विज्ञानी इर्विन श्रोडिंगर ने 1935 में की थी। दिलचस्प बात यह है कि श्रोडिंगर ने यह विचार क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी खामियों को उजागर करने के लिए दिया था। उस समय नील्स बोर और वर्नर हाइजेनबर्ग जैसे वैज्ञानिक ‘कोपेनहेगन व्याख्या’ का समर्थन कर रहे थे, जो यह कहती थी कि एक कण (particle) तब तक सभी संभावित अवस्थाओं में रहता है जब तक कि उसे मापा या देखा न जाए।
श्रोडिंगर को यह विचार बेतुका लगा। उन्होंने सोचा, “अगर हम इस नियम को एक बिल्ली जैसी बड़ी वस्तु पर लागू करें, तो क्या होगा?” और यहीं से इस मशहूर पहेली का जन्म हुआ।
मौत और जीवन का अजीब खेल

फोटो: विकिपीडिया से साभार।
श्रोडिंगर ने एक काल्पनिक परिदृश्य तैयार किया। एक स्टील के बक्से में निम्नलिखित चीजें रखी जाती हैं:
- एक जीवित बिल्ली।
- थोड़ी सी मात्रा में रेडियोधर्मी पदार्थ (Radioactive material) – इतना कम कि शायद अगले एक घंटे में उसका एक परमाणु डिकेप (क्षय) हो, या शायद न हो।
- एक गाइगर काउंटर (जो विकिरण का पता लगाता है)।
- जहर की एक शीशी और एक हथौड़ा।
व्यवस्था कुछ ऐसी है कि यदि रेडियोधर्मी परमाणु का क्षय होता है, तो गाइगर काउंटर उसे पकड़ लेगा। जैसे ही काउंटर सक्रिय होगा, वह एक हथौड़े को छोड़ देगा जो जहर की शीशी को तोड़ देगा और बिल्ली मर जाएगी। लेकिन, अगर परमाणु का क्षय नहीं होता है, तो बिल्ली जीवित रहेगी।
अध्यारोपण (Superposition) का रहस्य
अब असली विज्ञान शुरू होता है। क्वांटम यांत्रिकी के अनुसार, एक घंटे के बाद वह परमाणु ‘क्षयित’ और ‘अक्षयित’ दोनों अवस्थाओं के मिश्रण (superposition) में होता है। इसका मतलब है कि परमाणु ने एक ही समय में दोनों संभावनाएं धारण कर रखी हैं।
चूँकि बिल्ली का जीवन उस परमाणु की अवस्था पर निर्भर है, कोपेनहेगन व्याख्या के अनुसार, बिल्ली भी उस समय ‘जीवित’ और ‘मृत’ दोनों अवस्थाओं के अध्यारोपण (Superposition) में होनी चाहिए।
गणितीय रूप से, बिल्ली की अवस्था को एक ‘वेव फंक्शन’ (Wave Function) के रूप में लिखा जा सकता है जो ‘जीवित’ और ‘मृत’ का योग है। लेकिन जैसे ही आप बक्से का ढक्कन खोलते हैं, आप प्रकृति को एक विकल्प चुनने पर मजबूर कर देते हैं। इसे भौतिकी में ‘वेव फंक्शन का कोलैप्स होना’ (Collapse of the wave function) कहते हैं। आपके देखने मात्र से बिल्ली किसी एक निश्चित अवस्था (या तो जीवित या मृत) में आ जाती है।
क्या बिल्ली सचमुच जॉम्बी है?
श्रोडिंगर का उद्देश्य यह बताना था कि यह विचार कितना हास्यास्पद है। एक बिल्ली, जो एक जीवित जीव है, वह एक ही समय में मरी हुई और जिंदा नहीं हो सकती। उन्होंने यह दर्शाया कि क्वांटम नियम, जो इलेक्ट्रान और फोटॉन जैसे सूक्ष्म कणों पर लागू होते हैं, उन्हें सीधे तौर पर हमारी मैक्रोस्कोपिक (बड़ी) दुनिया पर थोपा नहीं जा सकता।
हालाँकि, विडंबना यह है कि आज वैज्ञानिक यह मानते हैं कि ‘सुपरपोजिशन’ वास्तव में होता है, लेकिन केवल सूक्ष्म स्तर पर। यह विरोधाभास आज भी वैज्ञानिकों के बीच बहस का विषय है कि क्वांटम दुनिया और हमारी सामान्य दुनिया के बीच की रेखा कहाँ खिंचती है।

ज्यूरिख में इरविन श्रोडिंगर के 1921-1926 के निवास स्थान पर बनी बिल्ली की प्रतिमा, जो अलग अलग प्रकाश में जीवित या मृत दिखाई देती है। / फोटो: Koogid/ विकिपीडिया
भविष्य की तकनीक की नींव
भले ही यह प्रयोग 1935 में एक आलोचना के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन आज यह आधुनिक तकनीक का आधार है। ‘क्वांटम कंप्यूटर’ इसी सिद्धांत पर काम करते हैं। सामान्य कंप्यूटर के ‘बिट्स’ (bits) केवल 0 या 1 हो सकते हैं, लेकिन क्वांटम कंप्यूटर के ‘क्यूबिट्स’ (qubits) श्रोडिंगर की बिल्ली की तरह एक ही समय में 0 और 1 दोनों हो सकते हैं। यही क्षमता उन्हें आज के सुपरकंप्यूटरों से लाखों गुना तेज बनाती है।
श्रोडिंगर की बिल्ली हमें सिखाती है कि ब्रह्मांड हमारी सामान्य समझ से कहीं अधिक रहस्यमय है। जब हम किसी चीज़ को नहीं देख रहे होते हैं, तो वास्तविकता वैसी नहीं होती जैसी हम सोचते हैं। जैसा कि प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी रिचर्ड
फाइमेन ने कहा था, “मुझे लगता है कि मैं सुरक्षित रूप से कह सकता हूं कि कोई भी क्वांटम यांत्रिकी को पूरी तरह नहीं समझता।” और शायद, उस बंद बक्से में बैठी बिल्ली भी हमसे यही कह रही है।

