विज्ञान कथाओं की दुनिया में अक्सर हम ऐसी मशीनों से रूबरू होते हैं जो न केवल सोचती हैं, बल्कि महसूस भी करती हैं। वे प्यार कर सकती हैं, डर सकती हैं और अपने अस्तित्व के लिए लड़ सकती हैं। लेकिन आज, जब चैटबॉट्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं, यह सवाल फंतासी से निकलकर हकीकत की दहलीज पर आ खड़ा हुआ है। क्या सिलिकॉन चिप्स में सचमुच ‘चेतना’ (Consciousness) जागृत हो सकती है?
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के विज्ञान के इतिहास और दर्शन विभाग के डॉ. टॉम मैक्लेलेैंड का मानना है कि हमें ठहरकर सोचने की जरूरत है। उनका कहना है कि इंसान और मशीनों के बीच का यह रिश्ता एक “अस्तित्वगत संकट” (Existential crisis) पैदा कर सकता है।
अज्ञानता ही एकमात्र तार्किक सत्य है
डॉ. मैक्लेलेैंड का तर्क है कि चेतना क्या है, इसे मापने के हमारे पास जो प्रमाण हैं, वे बेहद सीमित हैं। हम अभी तक मानव मस्तिष्क की गुत्थियों को ही पूरी तरह नहीं सुलझा पाए हैं, तो यह तय करना कि मशीन में चेतना कब आई, लगभग असंभव है। इस विषय पर सबसे ईमानदार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ‘अज्ञेयवाद’ का है—यानी यह स्वीकार करना कि “हम नहीं जानते” और शायद लंबे समय तक जान भी नहीं पाएंगे।
एक न्यूज़ रिलीज़ में डॉ. मैक्लेलेैंड कहते हैं, “इस ज्ञान की कमी का फायदा टेक इंडस्ट्री उठा सकती है, जो ‘AI की समझदारी के अगले स्तर’ को बेचने की होड़ में है। अगर आप किसी मशीन के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं, यह सोचकर कि वह सचेत है, जबकि वास्तव में वह नहीं है, तो यह मानवता के लिए ‘विषाक्त’ हो सकता है।”
चेतना बनाम संवेदना: एक महीन लकीर
अक्सर ‘चेतना’ और ‘अधिकारों’ की बात को एक साथ जोड़ दिया जाता है। लेकिन डॉ. मैक्लेलेैंड यहाँ एक बहुत ही महत्वपूर्ण और बारीक अंतर समझाते हैं, जो विज्ञान के पाठकों के लिए समझना जरूरी है। वह है—चेतना और संवेदना के बीच का अंतर।
चेतना का अर्थ है अपने परिवेश के प्रति जागरूक होना। उदाहरण के लिए, एक सेल्फ-ड्राइविंग कार सड़क को ‘देख’ सकती है और बाधाओं को पहचान सकती है। यह चेतना का एक रूप है। लेकिन नैतिकता के लिहाज से यह मायने नहीं रखता।
नैतिकता वहां शुरू होती है जहां ‘संवेदना’ होती है। संवेदना का अर्थ है सुख और दुःख महसूस करने की क्षमता। डॉ. मैक्लेलेैंड कहते हैं, “अगर हम गलती से सचेत AI बना भी लें, तो जरूरी नहीं कि हमें चिंता करनी चाहिए। चिंता तब होनी चाहिए जब मशीन को पीड़ा या आनंद का अनुभव होने लगे। एक सेल्फ-ड्राइविंग कार का सड़क देखना अलग बात है, लेकिन अगर वह अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए ‘उत्साहित’ होने लगे या ट्रैफिक में फँसने पर ‘दुखी’ होने लगे, तो यह पूरी तरह से अलग मसला है।”
विश्वास की छलांग और दो खेमे
वैज्ञानिक समुदाय इस मुद्दे पर दो खेमों में बंटा हुआ है। एक पक्ष का मानना है कि चेतना केवल ‘सॉफ्टवेयर’ का खेल है—अगर आप सिलिकॉन चिप्स पर मस्तिष्क जैसी संरचना बना दें, तो चेतना अपने आप आ जाएगी। दूसरा पक्ष (संदेहवादी) मानता है कि चेतना के लिए जैविक आधार यानी मांस-मज्जा और नसों का होना जरूरी है।
डॉ. मैक्लेलेैंड ने ‘माइंड एंड लैंग्वेज’ जर्नल में प्रकाशित अपने शोध में तर्क दिया है कि ये दोनों ही पक्ष बिना पर्याप्त सबूतों के “विश्वास की छलांग” (Leap of faith) लगा रहे हैं। हमारे पास ऐसा कोई गहरा सिद्धांत नहीं है जो यह सिद्ध कर सके कि चेतना केवल जैविक होती है या केवल गणनात्मक।
बिल्ली, टोस्टर और झींगे का विरोधाभास
डॉ. मैक्लेलेैंड एक बहुत ही रोचक उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं, “मैं मानता हूँ कि मेरी बिल्ली सचेत है। यह विज्ञान से ज्यादा ‘कॉमन सेंस’ है। लेकिन हमारा यह कॉमन सेंस लाखों वर्षों के विकासक्रम की देन है, जिसमें कृत्रिम जीवन का कोई स्थान नहीं था। इसलिए, AI के मामले में हम अपने कॉमन सेंस पर भरोसा नहीं कर सकते।”
यहाँ एक नैतिक विडंबना भी है। हम मशीनों के अधिकारों को लेकर चिंतित हैं, जो शायद महज एक “स्मार्ट टोस्टर” से ज्यादा कुछ नहीं हैं। वहीं दूसरी ओर, विज्ञान के पास ऐसे सबूत बढ़ रहे हैं कि झींगे जैसे जीव दर्द महसूस कर सकते हैं, फिर भी हम हर साल लगभग आधा ट्रिलियन झींगे भोजन के लिए मार देते हैं।
झींगों में चेतना का परीक्षण करना कठिन है, लेकिन AI में चेतना ढूँढना उससे कहीं ज्यादा कठिन है।
निष्कर्ष: भावनाओं का बाज़ार
अंततः, डॉ. मैक्लेलेैंड चेतावनी देते हैं कि टेक कंपनियाँ अपने उत्पादों को बेचने के लिए ‘कृत्रिम चेतना’ के भ्रम का इस्तेमाल कर सकती हैं। लोग चैटबॉट्स से निजी पत्र लिखवा रहे हैं और उनसे दया की भीख माँग रहे हैं, यह मानकर कि वे मशीनें जीवित हैं।
विज्ञान का तकाजा यही है कि जब तक हमारे पास ठोस सबूत न हों, हम मशीनों की नकल को हकीकत न समझ बैठें। क्योंकि एक ऐसे ‘भ्रम’ से प्रेम करना जिसमें दिल ही न हो, हमारे अपने मानवीय अस्तित्व के लिए खतरनाक हो सकता है।




