भारत में बढ़ती गर्मी और आर्द्रता का सामना करते हुए, एयर कंडीशनर अब केवल एक लक्जरी वस्तु नहीं बल्कि कई लोगों के लिए एक आवश्यकता बन गए हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह बढ़ती ठंडक हमारे पर्यावरण और हमारी जेब पर कितना बोझ डाल रही है? पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार की 2019 की ‘इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान’ रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2037-38 तक भारत में कूलिंग के लिए बिजली की खपत तीन गुना होने का अनुमान है। यह चौंकाने वाला आंकड़ा प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव डालेगा और उपभोक्ताओं के बिजली बिलों में भी अप्रत्याशित वृद्धि लाएगा। इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) दिल्ली के यांत्रिक इंजीनियरिंग विभाग के शोधार्थी एक अभिनव और अत्यधिक कुशल एयर कंडीशनर (ए.सी.) प्रणाली विकसित कर रहे हैं, जिसमें बिजली की खपत को लगभग एक-तिहाई तक कम करने की क्षमता है।

ऊर्जा-दक्षता की नई परिभाषा
प्रो. अनुराग गोयल के नेतृत्व में आई.आई.टी. दिल्ली की शोध टीम, जिसमें यांत्रिक इंजीनियरिंग विभाग के पीएच.डी. शोधार्थी अनंतकृष्णन के. भी शामिल हैं, ने इस नई पीढ़ी के ए.सी. के प्रयोगशाला-स्तरीय प्रोटोटाइप का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है। उनके प्रारंभिक परिणामों से पता चला है कि यह प्रणाली मौजूदा ए.सी. की तुलना में बिजली की खपत में लगभग 33% की कमी कर सकती है। यह केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह हमारे भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है जो ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता दोनों को बढ़ावा देगा।
मौजूदा ए.सी. प्रणालियों की सीमाएं और नई तकनीक का चमत्कार
वर्तमान में हम जिन वेपर-कंप्रेशन सिस्टम आधारित ए.सी. का उपयोग करते हैं, वे हवा को ठंडा करने के लिए एक ऊर्जा-गहन प्रक्रिया का पालन करते हैं। विशेष रूप से, हवा से नमी (आर्द्रता) हटाने के लिए, वे हवा को इतना अधिक ठंडा करते हैं कि नमी संघनित (कन्डेन्स) होकर पानी में बदल जाए। यह प्रक्रिया अत्यधिक बिजली की खपत करती है। प्रो. अनुराग गोयल के शोध समूह ने इस समस्या का एक सीधा और कुशल समाधान खोजा है। उन्होंने एक कॉम्पैक्ट ऐड-ऑन मॉड्यूल विकसित किया है जो सीधे हवा से नमी को हटाता है, जिससे अत्यधिक कूलिंग की आवश्यकता कम हो जाती है।
यह अभिनव मॉड्यूल कैसे काम करता है? इसमें नमक के घोल (जिसे लिक्विड डेसिकेंट कहा जाता है) का उपयोग किया जाता है, जो बाहर से आने वाली हवा में मौजूद जलवाष्प को प्रभावी ढंग से सोख लेता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मॉड्यूल में हवा और लवणीय घोल के बीच एक पतली और सिलेक्टिव पॉलिमर मेम्ब्रेन लगाई गई है। यह मेम्ब्रेन लवणीय घोल के कणों को भवन के अंदर की हवा में जाने से रोकती है, जो मौजूदा लिक्विड-डेसिकेंट प्रणालियों में एक सामान्य चिंता का विषय रहा है। इस तरह, यह प्रणाली हवा को शुष्क करने की प्रक्रिया को सुरक्षित और स्वच्छ बनाती है।
नवीनीकरण और ऊर्जा पुनर्उपयोग की कला
जब लवणीय घोल हवा से नमी सोख लेता है, तो वह पतला (डाइल्यूट) हो जाता है। निरंतर पुनः उपयोग के लिए, इस घोल को फिर से सुखाना (रीजनरेट करना) आवश्यक होता है। यहीं पर आई.आई.टी. दिल्ली की टीम का अभिनव सिस्टम एकीकरण अवधारणा (इनोवेटिव सिस्टम इंटीग्रेशन कॉन्सेप्ट) चमक उठता है। पारंपरिक तरीकों में एक बर्नर या इलेक्ट्रिक हीटर का उपयोग करके घोल को सुखाया जाता है, जिसमें अतिरिक्त ऊर्जा खर्च होती है। लेकिन इस नई डिज़ाइन में, शोधार्थियों ने एक स्मार्ट तरीका खोजा है। वे ए.सी. के कंडेंसर (जो बाहरी यूनिट होता है) से निकलने वाली अपशिष्ट ऊष्मा का उपयोग करते हैं। यह वही ऊष्मा है जिसे ए.सी. आमतौर पर वातावरण में छोड़ देता है। इस ऊष्मा को रीजेनेरेटर मॉड्यूल की ओर पुनर्निर्देशित किया जाता है ताकि लवणीय घोल को फिर से सुखाया जा सके। यह ऊर्जा पुनर्उपयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो समग्र प्रणाली की दक्षता को कई गुना बढ़ा देता है।
इस प्रणाली को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि यह भारत की विभिन्न बाहरी परिस्थितियों में वेपर कंप्रेशन और डेसिकेंट मॉड्यूल के बीच ऊर्जा अंतरण दर का सटीक संतुलन सुनिश्चित कर सके। यह अनुकूलन क्षमता इसे देश के विविध जलवायु क्षेत्रों में प्रभावी बनाती है।
पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ
प्रो. अनुराग गोयल ने इस सफलता के बारे में बताते हुए कहा, “प्रस्तावित प्रणाली का उपयोग करते हुए सामान्य परिस्थितियों में एक मानक कमरे के ए.सी. के लिए लगभग 1200 वॉट की कुल बिजली खपत की तुलना में, हाइब्रिड प्रणाली में बिजली की खपत घटकर लगभग 800 वॉट रह जाती है। इससे समान इनडोर कम्फर्ट स्टैंडर्ड्स को बनाए रखते हुए लगभग 33 प्रतिशत तक कम ऊर्जा खपत हुई। भारतीय जलवायु के विभिन्न प्रतिनिधि क्षेत्रों में अनुमानित ऊर्जा बचत अत्यधिक आर्द्र क्षेत्रों में लगभग 28 प्रतिशत से लेकर शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में लगभग 41.5 प्रतिशत है।”
ये आंकड़े केवल ऊर्जा बचत का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि ये पर्यावरण पर कार्बन फुटप्रिंट को कम करने और उपभोक्ताओं के लिए बिजली बिल में उल्लेखनीय कमी लाने का भी संकेत देते हैं। शोध टीम को दृढ़ विश्वास है कि इस प्रकार की सतत कूलिंग तकनीक, विशेष रूप से भारतीय भवनों में, व्यापक स्तर पर अपनाई जाएगी। यह न केवल गर्मी से राहत प्रदान करेगी, बल्कि ऊर्जा के जिम्मेदार उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी होगी।
आगे का रास्ता
इस महत्वपूर्ण कार्य पर आधारित ‘मॉडल-बेस्ड एनालिसिस ऑफ अ नोवेल हाइब्रिड मेम्ब्रेन-लिक्विड डेसिकेंट एयर कंडीशनर फॉर हाई-एफिशियन्सी स्पेस कूलिंग’ नामक एक अध्ययन जर्नल ऑफ बिल्डिंग इंजीनियरिंग में प्रकाशित हुआ है। यह शोध भारत के लिए ऊर्जा-दक्षता और पर्यावरण-अनुकूल कूलिंग समाधानों की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
संदर्भ और कड़ियां (References & Links)
- मूल समाचार विज्ञप्ति: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली
- शोध पत्र: जर्नल ऑफ बिल्डिंग इंजीनियरिंग में प्रकाशित




